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Tuesday, 18 September 2012

आओ ज़रा साथ चलते है..




आओ ज़रा साथ चलते है..
बेगाने रास्तों पर जीते है मरते है..
बहुत हो गई खुद से आंख मिचोली..
अब ज़रा अनकहे लफ्ज़ सुनते है..
ज़माना देख कर जलता है.. बाते बनाता है...
चलो ज़रा उसका सामना करते है...
इस दिल की.. इस जान की..
अपनी मजबूरियां है.. अपनी सरहदे..
चलो ज़रा दिल में उतरकर..  जिंदगी में बसते है..
मुझे नहीं चाहिए मजबूरियों का रिश्ता..
नहीं करनी है मुझे गुस्ताखियाँ कोई...
अपनी ही ख़ुशी से आओगे तुम.. 
अब हम ये आस रखते है..
आओ ज़रा साथ चलते है..




Friday, 14 September 2012

अच्छा लगता है. ..





उससे बातें देर तक करना अच्छा लगता है. 
दूर रह कर भी पास में रहना अच्छा लगता है..

आरज़ू नहीं मेरी.. नहीं  है मेरा इंतजार वो..
फिर भी उसकी बातों में खोना अच्छा लगता है..

ज़रा सा जानती  हूँ उसे. थोड़ा सा पहचानती हूँ..
लगता है कोई नाता उससे.. लगता है जैसे साथ है वो..
खुद को खोकर.. खुद को पाना अच्छा लगता है..


कुछ भी नहीं नाता उससे..ना ही कोई खास है वो..
बस गुफ्तगू के सिलसिले उससे.. मेरा कोई राज़दार है वो..
बात बड़ी अजीब है लेकिन अच्छा लगता है.. 
हर पल उसकी यादों में खोना अच्छा लगता है..

उससे बातें देर तक करना अच्छा लगता है..