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Wednesday, 18 December 2013

सिर्फ़ तुम्हें चाहता हूँ..


मुझे नहीं तख़्त-ओ-ताज़ कि ख़वाहिश..
आशिक़ हूँ तुमसे वफ़ा चाहता हूँ...

बड़ी मुद्दतों तक रहा है इंतज़ार तेरा..
तेरा अलील हूँ तेरा दीदार चाहता हूँ..

डर सा है जुदाई का निगाहों में मेरी..
तुमसे कुछ अनकहे से वादे चाहता हूँ..

तेरी खता कि भी खुदा से सजा मिली मुझे..
तेरे गुनाहों का अब में हिसाब चाहता हूँ..

मुझे नहीं मिलते हसने के बहाने कभी..
मैं ग़मज़दा हूँ मुस्कुराने कि वजह चाहता हूँ...

एक तुम्हें पाने को मांगी है दुआएं कई..
अब उस हर दुआ का मैं सिला चाहता हूँ..

तुम्हें तो न थी न होगी चाहत मेरी..
मैं तेरी ज़रुरत बनने का हुनर चाहता हूँ..

यूँ गुज़र गए जैसे राहों में अजनबी कोई..
कुछ सवालों का अब  तुमसे जवाब चाहता हूँ..

चले जाओ नहीं दूंगा कोई आवाज़ भी तुमको..
बस तेरे इस करम कि मैं वजह चाहता हूँ..

रहा होगा तुम्हें अरमान चाँद सितारों का मगर..
मैं तो बस तुम्हें.. सिर्फ़ तुम्हें चाहता हूँ..

Tuesday, 17 December 2013

इस तरह मैंने खुद को संभाला है ...

बगीचे में लगी शाख से गिरा पहला फूल ..
मैंने  अब तक उसे संभाले रखा है..
अब ज़रा अंदाज़ लगाओ..मैंने किस क़दर तेरी यादों को संभाले रखा है..

वो तेरी पहली नज़र..वो तेरा इज़हार-ए - मोहब्बत..
वो पहली झलक तेरी..वो मेरी पहली मोहब्बत..

संभाला है तेरे इश्क़ में मिला बहार का मौसम मैंने..
वो तेरी बाहों में कटी सर्दियां संभाली है..
वो तेरे लहजे के बिगड़ने से लगी गर्मी मुझको...
वो तेरे जाने से जो खिज़ा आई  है..

संभाली है तेरी यादों में मिली सिस्कियां मैने..
वो तेरे आने से मिली मुस्कराहट संजोई है..
तेरे इश्क़ के सारे मौसम संभाले है..
तुझसे ही मैंने ये दिन रात संभाले  है..

अब ये फूल जो मेरे हाथों मैं है ये मुरझाता जायेगा..
 अब ये जो दिल मेरे सीने में है बिखरता जायेगा..
ये शाख तो फिर से बहार देखेगी..
नए गुलों को फिर से.. ये खुद पर सजाएगी..

पर अब मेरी क़िस्मत में न होगी बहार-ए - मोहब्बत…
अब न मेरी ज़िन्दगी से ये खिज़ा जायेगी..
अब न आयेगी निगाहों में रौशनी मेरे..
अब न फिर ये ज़िन्दगी मुस्कुराएगी..