एक किताब है जो ना जाने कब से अधूरी पड़ी है..
कई बार सिरहाने मिल जाती है..
इतने लफ़्ज़ों को खुद में रख कर भी एक अरसे से खामोश थी..
कितना कुछ छुपा रखा है उसने खुद में..
फिर भी पहले कभी कोई शिकायत नहीं कि..
आज जाने क्या हुआ.. हद हो चुकी थी शायद उसकी..
उसके बर्दाश्त करने की हद...
आज चीख पड़ी वो मुझ पर.. कब से तुम्हारे सिरहाने पड़ी हूँ..
मुझे मुक़म्मल क्यों नहीं करती??
एक बार पढ़ो और ख़त्म करो इस इन्तिज़ार को.. क्यों परेशान करती हो??
तुम्हें कोई परवाह.. कोई फ़िक्र नहीं मेरी...
देखो मुझे… में पन्ना पन्ना बिखर रही हूँ.. उधड़ रही हूँ मैं
उस रात बहुत देर तक सुनती रही उसे..
एक गुब्बार था उसमे, जिसे मैं ख़त्म करना चाहती थी..
फिर खुदको उससे साझा किया मैने..
उसे हाथों में लिया, और वही पन्ना खोला जहां उसे आखिरी बार छोड़ा था..
देखो ये वही पन्ना है जिसे हम दोनों साथ पढ़ रहे थे..
उसके बाद वो कभी साथ नहीं रहा..
अब तुम देखो मुझे, मैं भी अधूरी हूँ तुम्हारी तरह..
तुम्हारी ही तरह ज़ार ज़ार बिखर रही हूँ ..
उधड़ रही हूँ मैं भी ..
फ़र्क़ बस इतना है की अब भी अपनी हद में हूँ ..
अब भी इन्तिज़ार में हूँ ..
चीख नहीं रही.. खामोश हूँ..
मुक़म्मल होने के इन्तिज़ार में.. अब भी..
पर हाँ वादा है तुमसे, जब वो एक बार फिर साथ होगा..
तुम्हें आगे ज़रूर पढूंगी.. उसी के साथ..
भरोसा रखो.. इन्तिज़ार करना ...
मेरे मुक़म्मल होते ही.. मैं तुम्हें भी
मुक़म्मल कर दूँगी..

awesome
ReplyDeleteThanks :)
DeleteReally amaxina.
ReplyDeleteReally *amazing
ReplyDeleteएक के सब्र का बांध टूटने लगा तो दूसरी ने पूर्ण होने की आशा की टेक्निक का सहारा देकर बचाया
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