मंज़ूर नहीं उन्हें गर साथ भी मेरा तो शिकायत कैसी
मुझे भी मेरे वजूद पर कोई नाज़ नहीं..
नहीं है गर उसे कोई ज़रूरत मेरी..
मुझे भी उसका अरमान... उसका ख्वाब नहीं..
मिला है हर शख्स मुझे कुछ इस तरह..
हुआ है मुझे पर कोई करम उसका... एहसान कोई..
हो गई है अब बेपरवाहियों से मोहब्बत मुझको..
रही अब मुझे मेरी कोई परवाह नहीं..
बिखरी जुल्फें.. बिखरा काजल..
सवरने की कोई ज़रूरत नहीं..
बड़े धोके.. ऐसे सितम सह कर..
दीदार-ए-यार की कोई चाहत नहीं..
उसे नहीं मुझसे इश्क तो रोना कैसा..
मुझे भी तो अब खुदसे इश्क नहीं..
उसकी वादाखिलाफी से हुई ना तकलीफ कोई..
मुस्कुराते रहने का खुदसे किया वादा मैने भी तो निभाया नहीं..