नाजायज़ मोहब्बत मेरी...
मोहब्बत मेरी हमेशा से नाजायज़ थी..
पर जायज़ क्या है..मुझे इसकी भी तो खबर ना थी...
वो ज़रा दिख भी जाता तो दिल को क़रार आ जाता था..
इससे ज़्यादा क्या मेरी सांसो की ज़रूरत थी.
उसे देख कर बालों को संवार लेती थी..
नज़र मिल जाये तो मुस्कुरा के नज़र झुका लेती थी..
ये नज़रें ही तो थी जो मुझे जान से प्यारी थी..
ज़्यादा कहां मेरी ख्वाहिशों से यारी थी..
चलते चलते जब हाथ टकरा जाते थे..
दुनिया से छुप कर जब होंठ मिल जाते थे..
वो ना था मेरा..ना मैं ही उसकी थी..
ये जायज़ मोहब्बत मेरी..कितनी नाजायज़ थी..
कितनी नाजायज़ थी।