लफ्ज़ ख़त्म होते है न जज़्बात ख़त्म होते है..
अच्छे लम्हे बुरे लम्हों में बस तब्दील होते है..
शख्स बदल जाता है अपनी फितरत से मजबूर हो कर..
जो नहीं बदलता वो बस उसके ख़याल होते है..
यूँ तो सब कुछ ही है मेरे पास मेरे लिए मगर..
क्यूंकि वो मुझे प्यारे है तो मेरे साथ नहीं होते..
जिंदा है मुझमे मेरी जिंदादिली कहीं..
ये भी सच है की वो मेरे बाद नहीं रहते..
तमाम खुशिया.. तमाम रंज मेरे.. मेरी दौलत है..
ऐसे फ़कीर भी ज़माने में कम नहीं होते..
तुझसे बिछड़ने का मुझे कोई खोफ़ नहीं मगर..
क्यों खुदसे बिछड़ने के हालात नहीं होते..
बड़ी बेरहम याद है तेरी ऐ यार मेरे..
तुझे खोकर भी हम तेरा साथ नहीं खोते..
कोई खबर नहीं रहती हमें रिश्ते नातों की जब..
तेरे हाथों में मेरे ये हाथ नहीं होते..
अपनी पहचान को तेरी पहचान में इस क़दर महसूस करते है..
जैसे कभी मेरे साथ मेरे साये नहीं होते..
इश्क ही जब बन गया है मज़हब मेरा..
फिर क्यों मेरे खुदा मुझे अपने साथ नहीं रखते..
रख दिया मेरे शाने पे तूने जब ये हाथ अपना..
तन्हा होते है मगर अब तन्हा नहीं होते..
