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Friday, 13 July 2012

इंसान तू अब इंसान न रहा..

इंसान तू अब इंसान ना रहा..

मुझे इस बात पे कोई इत्तफ़ाक ना रहा..
खुदा का बन्दा तू.. ज़िन्दगी खुदा की नेमत है..
उसी खुदा का अब तुझे कोई खोफ ना रहा.
अपने गुरुर अपनी ज़िद के आगे.. 
चल तेरा कोई अब जोर ना रहा..
इंसानियत तुझे जानवर से अलग करती रही.. 
अफ़सोस तू तो अब जानवर भी ना रहा..
जूनून तुझे सबको नोचने खरोचने का है..
खुद जेसे तुझे कोई दर्द ना रहा.
ना तू आगे बढ़ता है.. ना किसी को बढ़ता देख  पाए...
 संतोष तुझे अब किसी बात का ना रहा..
 इंसान तू अब इंसान न रहा...

10 comments:

  1. The Harsh truth of Life it has become.. Tale of descend of the human race well capture with words it is..

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  2. अफ़सोस तू तो अब जानवर भी ना रहा..

    बिलकुल सही कहा...
    बनने चले थे क्या और क्या बन गए हम..
    सुन्दर रचना...

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  3. ati sundar....hame bahut pasand aya pooooopooooooo....loved it really...:)

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