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Saturday, 2 February 2013

महफूज़ रहने का कोई इरादा न रहा..


महफूज़ रहने का कोई इरादा न रहा,
महफूज़ रहने का कोई फायदा न रहा..
तुम कौनसा मुझे दर्द देने से बाज़ आते हो,
दिल का हाल जो सुना दे वो तराना न रहा..
कुबूल ही कर लेने है फैसले तुम्हारे,
रोज़ रोज़ बच  के गुज़र जाने का रास्ता न रहा..
बेहतर है अब खुद को ही दिलासा दूँ में,
तुम्हे समझाने का कोई बहाना न रहा...
आखिर अब अगर मुझे उजड़ ही जाना है,
खुदको सवांरने का ठिकाना न रहा...
तुम जिसे खिलौना समझ कर हो खेलते रहे,
अब दिल वो खिलौना न रहा...
बड़े मजबूर रहे हो मुझे अपना कहने में तुम, 
अब मुझे भी तुझे पाने का कोई खवाब न रहा..
महफूज़ रहने का कोई इरादा.. कोई फायदा न रहा....

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