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Tuesday, 8 December 2020

तुम्हारा शहर



 


तुम्हारा शहर मुझे कभी शहर में आने की इजाज़त 
नहीं देता..
मैं हर बार उस शहर की सरहद से लौट आई हूं.
हर बार वापसी में उसे कौसती रही.. पत्थर मारे उसे...
दुआ की के तुमसे तुम्हारा ये शहर छूट जाए.. 
तूम मेरे हो जाओ. नादान थी..
इतना भी नहीं समझ या  कि आने की इजाज़त तो मुझे तुम्हारी ज़िन्दगी में भी नहीं..
 उससे तुम्हें अलग करने की दुआ तो नहीं मांगी जा सकती ना..
 तुम्हें पाने में नाकामयाब हो कर.. कहीं सारी दुनिया से न लड़ पडूँ.. 
तो फिर यूँ किया कि मैंने दुआ में तुमसे जुदाई मांग ली.. 
और देखो..
ये दुआ कितनी आसानी से क़बूल कर ली तुम्हारे खुदा ने..
बिना वक़्त गवाए।

(Picture Courtesy - Mr. Gajraj singh Parmar)

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