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Tuesday, 8 December 2020

अपाहिज़



 अपाहिज़


अपाहिज़ हूँ.. लगती नहीं ना? पर हूँ...

दस साल की थी, मां के साथ नानी घर जा रही थी। वो मायके जा कर खुश थी.. मैं उस घर जहाँ खाने में गाजर का हलवा मिलता है और रोज़ रात को मूंगफली।

इससे ज़्यादा ख्वाहिशें थी ही नहीं मेरी।

नानी के घर की गली पर ही मां एक तेज़ आती कार से टकरा गई।मैंने भी मां का हाथ पकड़ा था सो मां अपने साथ मेरा हाथ ले गई।

अब क्या करें.. मां को कौन मना कर सकता है।

पापा का अब काम बढ़ गया था। 15 साल से पापा पापा बने हुए..मां बने हुए और मेरा एक हाथ भी।

बेचारे मेरे साथ - साथ वो भी अपाहिज़ हो गए थे।

मेरे एक हाथ नहीं था और पापा को एक पल आराम।

वक़्त बितने लगा और पापा बूढ़े होने लगे।

फिर एक दिन एक तूफान आया.. तेज़ तूफ़ान..

सरकार ने उसे भी एक नाम दिया "Lockdown"

पापा की फैक्ट्री उस तूफ़ान में उजड़ गई।

और बिना काम के वो भी मेरी तरह परफेक्ट अपाहिज़ हो गए। 

उदास रहने लगे वो..घर से घंटों गायब। 

एक दिन हिम्मत करके उन्हें एक खत लिखा.. ढेर सारा प्यार और ढेर सारी हिम्मत लिख कर दी उन्हें.. और उसी के पास रखा था एक कटोरी गाजर का हलवा।

"कैसे किया ये तुमने??"

 हाथ बढ़ा कर बताया...इससे..

"पापा में अब उतनी अपाहिज़ नहीं रही.. आपका सहारा बन सकती हूं.."

पापा ने खत के पास अपनी नई दुकान के कागज़ रख दिये।

"तेरा बाप भी अब उतना अपाहिज़ नहीं रहा.. तेरा सहारा बन सकता है।"

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